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अधोगमन

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पके हुये,
फलों की,
फिर से,
गुठली मे,
तब्दील होने की,
चेष्टा,
वृक्ष को,
तोड़ देती है।
जैसे,
बहती हुयी अविरल,
नदी का रुख,
अवरोध रूपी,
शिला,
मोड़ देती है ।
———-
फिर शुरू होता है,
अस्वीकृति मे छुपी,
स्वीकृति को,
निकालने का क्रम।
और तिरोहित,
हो जाते है,
प्रेम की चादर पर,
फैले हुये,
सारे भ्रम ।

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
November 19, 2013

सुन्दर शब्द !


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