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ज्योतिष वनाम नियति

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मित्रो,
उत्तराखंड की विनाशलीला के बाद अनेकानेक विषयों पर बहस शुरू हो चुकी है जन मानस मे। फेस्बूक भी इससे अछूती नहीं है (या कहे कि सर्वाधिक बहस इसी platform पर हो रही हैं)। कलीम अव्वल सर ने एक बड़ा ही सटीक पोस्ट किया है जो कि चिंतनीय/मननीय/ व सार्थक चर्चा के योग्य है । पहले पोस्ट देख लेते हैं फिर मैं अपने विचार रखता हूँ….
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कलीम अव्वल

संसार में इतने ज्योतिषी / इतने नुजूमी है ०
क्या / उन्हें / इन प्राकृतिक आपदाओं से संसार को समय पर
अवगत नहीं कराया जाना चाहिए ०

ऐसा होता /तो/ कितने प्राणों की रक्षा हो सकती थी ०
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वास्तव मे, कलीम साहब कि ये चिंता / पीड़ा वाजिब है। यदि ऐसी कोई विधा है तो क्या उसका प्रयोग मानव सेवा के लिए नहीं किया जाना चाहिए (जो इस विधा के जानकार/पारंगत आदरनीय परोपकार कर रहे हैं इस ज्ञान का प्रयोग करके, कृपया वो नज़रअंदाज़ करें—–एक प्रार्थना) बजाय दुकाने सजाने के? क्या वाकई ऐसी कुछ विधा है जो भाग्य बदल सके? यदि हाँ तो फिर क्यूँ महाकवि संत तुलसीदास जी ने रामचरित मानस मे लिखा कि

# होई हे वही जो राम रची राखा, को करी तरक बड़ाबहि शाखा। (रामचरितमानस—बालकांड ; शिव धनुष के टूटने पर परशुराम लक्ष्मण संवाद) #

जबकि तुलसीदास जी स्वयं ज्योतिष के प्रकांड विद्वान थे? फिर क्यूँ गुरु वशिष्ठ जी के श्री राम के राज्याभिषेक के लिए अत्यंत शुभ मुहूर्त निकाले जाने के वावजूद भी उन्हे बनवास जाना पड़ा? दूसरा पक्ष देखें तो हिन्दू पुरानों के अनुसार प्रभु श्री राम का वनगमन व उस पूरी अवधि के दौरान जो कुछ भी हुआ रावण के वध आदि , सब कुछ पहले से ही निर्धारित था । उनका जन्म ही उस उद्देश्य के लिए हुआ था (मैं हिन्दू परिवार मैं जन्मा हूँ अत: हिन्दू सनातन धर्म का ही अधिक ज्ञान हे वजाय अन्य धर्मों के)।

कहने का अर्थ हे कि यदि सब कुछ पहले से ही निर्धारित है जिसे नियति/भाग्य कहा जाता हे तो फिर ज्योतिष या अन्य किसी विधा पर प्रश्न क्यूँ? फिर इनकी उपयोगिता कहाँ? ये एक ऐसा विषय हे जिस पर अनंत काल तक चर्चा / मनन होती रहेगी।

मुझे लगता है कि ज्योतिष को हमने उस स्वरूप मे न जाना है न समझा है जिस उद्देश्य के लिए ऋषियों/विद्वानों ने इसको प्रतिपादित किया. हमने सिर्फ इसको एक कौतुक के रूप मे विना किसी खास श्रद्धा के लिया। जिसका कारण इस क्षेत्र मे विद्वानों का कम व्यवसायपरक कम ज्ञानी लोगों का पिछले 20 सालों मे कुकुरमुत्तों की तरह उग आना है। मैं इस विधा के बारे मे कोई ज्ञान नहीं रखता पर हाँ इतना ज़रूर मानता हूँ कि इस तरह की विधा से जो कि स्वयं एक विज्ञान भी है, मार्गदर्शन ज़रूर मिल सकता है। फिर भी मेरा ढृन विश्वाश हे कि आप नियति/प्रकृति से पार नहीं जा सकते ………………..सब कुछ पहले से ही निर्धारित हे । कर्ता कौन हे? —कोई उसे भगवान कहता हे, कोई खुदा। किसी के लिए वो मंदिरों मे है, कोई मस्जिदों मे ढूँढता हे, तो कोई निर्बल की सेवा मे। किसी को वो बाल-मुसकानों मे दिखता है तो किसी को चित्र बनाने मे। कोई उसे संगीत मे पाता है तो कोई प्रकृति की गोद मे………..अनेकानेक जगह हे….कण कण मे…..वही है जो इस ब्रह्मांड की धुरी है-आदि भी और अंत भी।
फिर भी यदि कोई व्यक्ति नियति को पलटने का दंभ भरता है तो उसके लिए मैं क्या कहूँ –आप लोग ही कुछ कहो।
हरी ॐ

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