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यादें

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रचना काल- ३० अप्रैल १९९६
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यादों के सिलसिले निरंतर चलते रहते हैं,
कभी दिल रेगिस्तानी जीवन में,
प्यार के फूल खिलाना चाहता है, तो कभी,
खुद अकारण जिरह करता है-और,
जिरह करते करते थक जाता है–सो जाता है|

आखिर यादों में क्या है?
जिसके लिए,
यह बार बार अतीत में जाना चाहता है,
उस भूले बिसरे गुमनाम अतीत को खोजता है|
बार बार प्रेम की और खींचता है-और,
विरह के थपेड़े खाता है|
उदास होता है-कुछ देर के लिए,
कभी कभी अधिक देर तक……
फिर वीरानों में मुस्कराता है|
आखिर क्यूँ?
समझने की बार बार कोशिश करता हूँ, पर
असफल होता हूँ|
थक जाता हूँ–सोचते सोचते,
मैं भी सो जाता हूँ..
“क्यूँ” वहीँ के वहीँ रह जाता है…………हर बार|

copyright@Himanshu Nirbhay

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