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बूड़ी खाल

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रचना काल- ४ नवम्बर १९९७
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सर्द जाड़ों में वो बूड़ी खाल,
एक जलन की चाह करती है|
रात भर ठिठुरती है, सिकुडती है—दोपहर की धूप तक|
फिर से कुछ फैलती है,
अपना कद बडाती हुयी|
फिर से सिकुड़ने लगती है–सर्द खून के साथ|
न जाने कब से, कितने जाड़ों मे,
वो सिकुड़ी है…..फ़ैली है कुछ देर के लिए,
अपने भाग्य को कोसती हुयी|
तपती दोपहर के इंतज़ार में,
फिर से सिकुड़ने लगती है—-एक तपिश के लिए|

copyright@Himanshu Nirbhay

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