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ठंडी बयार

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रचना काल- २ अप्रैल १९९८
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ठंडी बयार चलती है जब,
अंतर्मन को हर्षाती सी |

तपते तन को शीतल करती,
इठलाती , बलखाती सी|
फूलों पत्तों से लिपट-लिपट,
डाली-डाली से चिपट-चिपट,
बालपन दर्शाती सी…….
ठंडी बयार चलती है जब….

योवन से उन्मादित होकर,
फिरती रहती हे बेकल सी,
इस अम्बर से उस अम्बर तक,
मेघों से लेके समुन्दर तक,
प्रेम गीत सुनती सी…
ठंडी बयार चलती है जब…..

copyright@Himanshu Nirbhay

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