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ऐसा ही होता है....

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(रचना काल- १४ मई , २०१३ )

ऊपर छत पे चाँद आता रहा|
नीचे वो रोज पहरे लगाता रहा|

निकम्मा हो गया एक दिन वो, जो
हराम की रोटियां ता-उम्र खाता रहा|

बूड़े माँ-बाप की इज्ज़त ना कर सका कभी|
अपने बच्चों को जो इज्ज़त करना सिखाता रहा|

पूछने आया था बीमार का हाल एक मेहरबां|
वो अजीब शख्श अपनी परेशानियाँ ही बताता रहा|

Copyright@Himanshu Nirbhay

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
May 14, 2013

सुन्दर भाव बूड़े माँ-बाप की इज्ज़त ना कर सका कभी| अपने बच्चों को जो इज्ज़त करना सिखाता रहा|

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    May 15, 2013

    आदरणीय निशा जी, आशीर्वाद रुपी सराहना के लिए हार्दिक आभार…….

ऋषभ शुक्ला के द्वारा
May 14, 2013

सुन्दर रचना http://rushabhshukla.jagranjunction.com/

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    May 14, 2013

    धन्यवाद ऋषभ जी,


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