kaduvi-batain

jeevan-satya darshan

39 Posts

129 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 12311 postid : 33

ओ ऊंचे महलों वालो

  • SocialTwist Tell-a-Friend

रचना काल- ३० अप्रैल २००३
———————————–
ओ ऊंचे महलों वालो,
तनिक द्रष्टि नीचे भी डालो

भूखे-प्यासे-बेबस कितने,
जीवन रोज़ यहाँ मिटते हैं|
तड़फ तड़फ कर, सिसक सिसक कर,
कितने सपने यहाँ बिकते हैं|

फूलों सी कोमल शैय्या पर,
बेचैनी की नींद बुलाकर,
सो जाते हो जब तुम छुपकर,
तभी धरा के अल्पभाव मैं
कितने नयन यहाँ जागते हैं|

क्षुधापूर्ति जब तुम करते हो,
सुरापान का रस लेते हो,
सपनीली राहों पे चलते हो,
उसी राह पे न जाने कितने,
भूखे पेट यहाँ दीखते हैं|

वैभव का यह दंभ हटाकर,
करुणा के आँगन मैं आकर,
थोड़ी सी दया दिखला दो–
इसी आस मैं पंक्तिबद्ध हो,
कितने पग खड़े थकते हैं|

ओ ऊंचे महलों वालो,
तनिक द्रष्टि नीचे भी डालो

Copyright@Himanshu Nirbhay

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

6 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    March 21, 2013

    शालिनी जी, प्रतिक्रिया के लिए बहुत आभार|

nishamittal के द्वारा
March 15, 2013

बहुत सुन्दर रचना अमीरी गरीबी की खाई पर

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    March 15, 2013

    आदरणीय निशा जी, आशीर्वाद की लिए आभार… एक कडुवा यथार्थ सच है है ये….प्रतिदिन देखता हूँ और व्यथित होता हूँ…फर्क मिटाने के लिए नहीं बल्कि अभावग्रस्त लोगों की बुनियाद्दी आवश्यकताओं के लिए हमे आगे आना ही चाहिए और यथासंभव मदद करनी चाहिए..

manoranjanthakur के द्वारा
March 15, 2013

.कितने पग खड़े थकते हैं| ओ….बहुत खूब …

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    March 15, 2013

    स्नेह रुपी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ठाकुर साहव…


topic of the week



latest from jagran