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दूर कहीं

Posted On: 6 Sep, 2012 Others में

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रचना काल–६ सितम्बर २०१२
——————————
दूर कहीं वो बस्ती है|
मानवता जहाँ हंसती है|

ये वो गाँव नहीं वो शहर नहीं,
सपनीली इच्छित डगर नहीं,
चहके किलकारी स्वच्छंद जहाँ,
मंदिर सा पावन वो घर नहीं,

पर क्या है ये जगह दोस्तों,
जहाँ बचपन को जवानी तरसती है|
दूर कहीं वो बस्ती है|……….

शब्दों पे विठा हुआ पहरा,
रजनी का जाल घना गहरा,
तम ही तम है अंतर्मन में,
हर मानव बना हुआ बहरा,

वो भोर कभी तो आयेगी
जिसमें सुगंध महकती है|
दूर कहीं वो बस्ती है|…….

हर प्रश्न क्यूँ अनुत्तरित,
हर पुष्प क्यूँ अपल्ल्वित,
हे वृक्ष, लता बतला दो ज़रा,
क्यूँ हो तुम भी अनुसूचित,

पर आएगा मेघ घुमड़, घुमड़,
चातक की आँख तरसती है|
दूर कहीं वो बस्ती है|
मानवता जहाँ हंसती है|

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
September 10, 2012

हर प्रश्न क्यूँ अनुत्तरित, हर पुष्प क्यूँ अपल्ल्वित, हे वृक्ष, लता बतला दो ज़रा, क्यूँ हो तुम भी अनुसूचित, पर आएगा मेघ घुमड़, घुमड़, चातक की आँख तरसती है| बहुत सुन्दर शब्दों से सजी रचना ! वाह

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    September 10, 2012

    सराहना के लिए धन्यवाद योगी जी….

dineshaastik के द्वारा
September 8, 2012

निर्भय जी बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति……

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    September 10, 2012

    सर जी , सप्रेम धन्यवाद…

vikramjitsingh के द्वारा
September 7, 2012

भावपूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति….. सादर… निर्भय जी……

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    September 7, 2012

    विक्रम जी, आपकी निरंतर सराहना ही हमारा संबल है, आभार सहित प्रणाम

nishamittal के द्वारा
September 7, 2012

सुन्दर रचना निर्भय जी वो भोर कभी तो आयेगी जिसमें सुगंध महकती है| दूर कहीं वो बस्ती है|……. हर प्रश्न क्यूँ अनुत्तरित, हर पुष्प क्यूँ अपल्ल्वित, हे वृक्ष, लता बतला दो ज़रा,

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    September 7, 2012

    आदरणीय निशा जी, सादर प्रणाम . आप जैसी विद्वानों के ह्रदय को यदि रचना छु जाती है और आशीर्वाद मिलता है तो ये हमें प्रेरणा देता है…वर्तमान परिद्रश्य में मानवता के हाल को बयां करने का प्रयास है ये कविता..


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