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अब खुलें मौन के द्वार

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रचना काल–२७ जनवरी २००३
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अब खुलें मौन के द्वार

हो रहा हा-हा कार,
चहुँ और चीत्कार,

उजड़ गयीं माँगें,
लुट गया श्रृंगार,

मन का मीत रूठ गया,
आँचल का अमृत सूख गया,

क्यूँ है विश्व मौन?

तपते मन, उघडे तन,

नेह को पिघलने दो,
मेह को बरसने दो,
हो गया निर्णय —-अब मौन द्वार खुलने दो,
अब मौन द्वार खुलने दो|

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

manoranjanthakur के द्वारा
September 5, 2012

दिल को छू गई पिघल गया नेह भर गया स्नेह बहुत बधाई

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    September 5, 2012

    बहुत शुक्रिया ठाकुर साहब, सस्नेह, आपका…

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
September 5, 2012

अब खुलें मौन के द्वार हो रहा हा-हा कार, चहुँ और चीत्कार, उजड़ गयीं माँगें, लुट गया श्रृंगार,,,,, बहुत अच्छी रचना निर्भय जी बधाई हो ,,,,

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    September 6, 2012

    धन्यवाद सर जी,

vikramjitsingh के द्वारा
September 5, 2012

वर्तमान कुवय्व्स्था पर करार कटाक्ष……..

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    September 5, 2012

    धन्यवाद विक्रम भाई,

ashishgonda के द्वारा
September 5, 2012

आदरणीय! बहुत ही प्रसांगिक कविता लिखी इसके लिए आपको धन्यवाद, किसी ने कहा भी है- “कब तक मौन रहोगे विदुरों, कब अपने लब खोलोगे, जब सर ही कट जाएगा, तब किस मुंह से बोलोगे…” कृपया समय मिले तो मेरे पन्ने पर भी आयें- http://ashishgonda.jagranjunction.com/2012/09/05/%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%95-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8/

    Himanshu Nirbhay के द्वारा
    September 5, 2012

    प्रिय आशीष, शुभाशीर्वाद… प्रतिक्रिया के लिए धन्यबाद…आपका पन्ना ही पड़ रहा हूँ….


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